वास्तविक आनंद के लिए क्या करें? | Hindi Gyan

मनुष्य का मूल स्वभाव है, प्रसन्नता अथवा आनंद | हम सब हर पल हर घड़ी आनंद में ही जीना चाहते हैं, जीना भी चाहिए इसलिए तो हर पल आनंद की खोज में लगे रहते हैं | आनंद प्राप्ति के लिए न जाने क्या-क्या करते रहते हैं अच्छा खाना है, अच्छा पहनते हैं, घर को भी खूब सजाकर रखते हैं लेकिन बात बनती नहीं आनंद पाने के लिए हम जितनी अधिक भागदौड़ करते हैं, झटपटाते  हैं, आनंद उतना ही हमसे दूर भागता है | 

वास्तविक आनंद के लिए क्या करें  Hindi Gyan

इसे प्राप्त जीवन को खुशियों से भरे आनंद का सीधा संबंध है और सरलता से हम जितना सहज और सरल होते हैं | उतना ही अधिक आनंद में हो गया है, जीवन के हर क्षेत्र में लगभग हम एक दूसरे से आगे बढ़ने की जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रतियोगिता दूसरों से तुलना में क्या आनंद प्राप्त किया जा सकता है पर आनंद कैसे प्राप्त करें कहां खोजें |

हम आनंद को कहां खोजते हैं?

प्रश्न उठता है कि हम आनंद को कहां खोजते हैं? आज हम बाहर की दुनिया में खुशी तलाशते हैं | चीजों में सुख तलाशने है धन, दौलत ,पद, प्रतिष्ठा में आनंद हमारी खुशी हमारा आनंद हमारी मनचाही वस्तु या घटना पर आधारित मनचाही वस्तु पा लेते हैं या मनचाही घटना घटित हो जाती है, तो हम खुश वरना हमें हमारे दुख की सीमा नहीं रहती | 

हमारा आनंद किसी सहारे पर टिका रहता है जैसे ही वह सहारा या आधार खिसकता सकता है | हम आनंद रहित  हो जाते हैं, ऐसा आनंद वास्तविक आनंद नहीं हो सकता धन, दौलत, पद, प्रतिष्ठा, आज्ञाकारी बच्चे, मनचाहे भोजन,  वस्त्र, जैसी शारीरिक एवं अन्य भौतिक सुख सुविधाएं न होने पर भी जहां मन में कष्ट ना हो और जो उपलब्ध उसी में संतुष्टि का भाव बना रहे उसे ही वास्तविक आनंद कहा जा सकता है |

तो फिर ये वास्तविक आनंद कैसे प्राप्त हो सच्ची खुशियां आनंद पाना है तो उसे चीजों और घटनाओं से जोड़ना छोड़ देना होगा, उसी को बाहर तलाश करने की वजह उसे अंदर खोजना होगा | 

आनंद का वास्तविक स्रोत हमारे भीतर है

आनंद का वास्तविक स्रोत हमारे भीतर है. हमारा मन तथा हमारे मानक के भाव ज्यादा महत्वपूर्ण है | यदि मन आनंद से भरा है तो बाहरी संसार में चीजों की कमी भी हमारे आनंद में कमी नहीं कर सकती | 

सकारात्मक विचारों में ओत प्रोत मन ही सच्चा आनंद दान करने में सक्षम है | अब धर्म की इसमें क्या भूमिका हो सकती है | इसके लिए धर्म के वास्तविक स्वरूप को भी जाना चाहिए क्या है और कुछ नहीं केवल अच्छे आदतों  का समूह है जो सकारात्मक ढंग से जीवन जीने में सहायक होते हैं | 

सकारात्मक ढंग से जीवन जीना

सकारात्मक ढंग से जीवन जीना ही आनंददायक हो सकता है, नकारात्मक ढंग से नहीं इसलिए जीवन को अच्छी तरह जीने के लिए धर्म में परिवर्तित होने की आवश्यकता है | धर्म के तीन प्रमुख तत्व या अंग माने गए हैं अध्यात्म अथवा दर्शन, नैतिकता प्रतीक, कर्म काण्ड, आध्यात्म  या दर्शन धर्म का आंतरिक तत्व है जबकि प्रतीक और कर्मकांड ब्रहा तत्व है | 

आंतरिक तत्व ज्यादा महत्वपूर्ण है. आंतरिक तत्व ही हमारा साध्य होना चाहिए क्योंकि ब्राहा तत्त्व तो साधन मात्र है |  ब्राहा उसकी प्राप्ति में सहायक हो सकते हैं, धर्म का आंतरिक तत्व जिसे दर्शन या नैतिकता अथवा आध्यात्म कहते हैं | 

सात्विक भव्य

मेरे विचार से वह हमारा आचरण ही है, यह मनुष्य के विचार से संबंधित है विचार का अर्थ है, सात्विक भव्य सकारात्मक चिंतन से उत्पन्न आचरण या नहीं है | इन्हें दिखाया नहीं जा सकता कार्य हम विचार के वशीभूत होकर करते हैं जैसे धर्म होगा वैसा ही कार्य करेंगे |

आज हमारे समक्ष इतनी भी समस्याएं हैं वे सब धैर्य का पालन ना करने के कारण ही है | आज राजनीति में जो मूल्य विनता देखने में आ रही है वह भी धैर्य अथवा धर्म के अभाव के कारण ही है | 

जीवन जीने की जो कला है वह धर्म है, धर्म के अभाव में उत्कृष्ट जीवन तो दूर सामान्य जीवन जीना भी असंभव है |  धैर्य जीवन जीने की कला और धर्म का लक्षण है | 

धर्म के दस लक्षण

धर्म के नौ लक्षण बताए गए हैं -

  1. धैर्य
  2. क्षमा
  3. दम
  4. चोरी ना करना
  5. संयम
  6. बुद्धि
  7. विद्या
  8. सत्य
  9. क्रोध

यह धर्म के नौ लक्षण है धर्म को यहां पहले स्थान पर रखा गया है वास्तव में जिस व्यक्ति में धैर्य नहीं है वह धार्मिक नहीं हो सकता | वह धर्म में धैर्य अभाव है वह धर्म ही नहीं है जहां धर्म के नाम पर तलवारे किसी रहते हैं न जाने वहां कैसे धर्म है |

हमारे रोजमर्रा के जीवन में भी तो कमोबेश यही हो रहा है, किसी ना किसी तरह की तलवार हमारे सर पर लटक की रही है | हम हर पल किसी न किसी प्रकार के तनाव से ग्रस्त रहते हैं. इसका प्रमुख कारण है धैर्य कि कमी ही तो है | 

धैर्य का अभाव

हम सब कुछ आज और इसी समय हासिल कर लेना चाहते हैं | हमारे पास पर्याप्त साधन नहीं है तो क्या हुआ जो चाहिए किसी भी गलत सही तरीके से हासिल कर लेते हैं | धैर्य के अभाव में हम अनैतिक ही नहीं अपराधी बनते जा रहे हैं किसी वस्तु को पाने के लिए झूठ बोलने से परहेज नहीं करते हो तो झूठ नहीं बोलेंगे | 

सत्य का पालन करेंगे सत्य भी धर्म का एक लक्षण है धैर्य इतना चुक गया है कि किसी कार्य को करने से पूर्व परिणाम के बारे में सोचते तक नहीं | धैर्य हो तो बुरे कार्य करने अथवा बुरे समय को कोसने की अपेक्षा अच्छे दिनों की प्रतीक्षा करेंगे | धैर्य के अभाव में बुरे काम का बुरा परिणाम भुगतना ही पड़ता है |

निष्कर्ष 

धैर्य नहीं तो क्षमा करना भी संभव नहीं है | धैर्य नहीं तो दम, चोरी न करना, संयम, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध धर्म के इन अन्य सभी लक्षणों का विकास हो ही नहीं सकता | धैर्य के अभाव न तो मन पर नियंत्रण करना ही संभव है और न मन का शुभ संकल्पमय होना ही संभव है | अतः वास्तविक आनंद के लिये धैर्य पूर्वक धर्म सम्मत प्रयास ही वरेण्य है |

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