एक शिष्य के जीवन को सजाने मे, सवारने मे गुरु की वही भूमिका है | जो किसी पौधे के संपूर्ण विकास मे एक माली की होती है, किस पौधे को कब और कितना खाद और पानी चाहिए इसे एक माली बखूबी जानता है | एक माली, एक नन्हे से पौधे को लगाता है उसे सींचता है, उसे कीड़ो से पशुओं से रोगों से बचाता है | तभी तो एक दिन एक नन्हा सा पौधा ही वृक्ष बनकर आकाश को छूने लगता है |
माली के कारण ही तो एक दिन सारा गुलशन महक उठता है | वैसे ही गुरु भी शिष्य में एक नई चेतना को जन्म देता है, वह उसकी चेतना को अपने ज्ञान अमृत से सीचता है | वह उसे हर रोगों से बचाता है, दुर्गुणों से बचाता है, तभी तो एक दिन वह शिष्य अपनी चेतना की शिखर को छू पाता है और ब्रह्म साक्षात्कार कर पाता है |
एक दिन शिक्षा का जीवन भी गुलशन की तरह महकता है उस परित्कृत को उपलब्ध शिष्य को देखकर एक गुरु को कैसी आनंद अनुभूति होती होगी. उसे शब्दों में बता पाना कैसे संभव है क्योंकि वह तो शब्द भी निशब्द हो जाती है |
उस शिखर तक पहुंचने के लिए एक शिष्य को स्वयं को पूर्णता अपने गुरु के हवाले करना होता है |
आध्यात्मिक ऊर्जा
माली के हवाले करना होता है और अपनी इच्छाओं का कामनाओं का सर्वथा त्याग करना होता है | दूसरे शब्दों में कहें तो जैसे एक रोगी स्वयं को पूर्णता एक चिकित्सक के हवाले कर देता है |
ऐसे ही एक शिष्य को भी स्वयं को गुरु के हवाले कर देना होता है क्योंकि तभी गुरु एक कुशल चिकित्सक की तरह शिष्य की चेतना में अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार कर पाता है | उसके चित्र की व्यक्तियों के कारण रूप उसके कारण संस्कारों के समूल नाश का विनाश का मार्ग प्रशस्त कर पाता है |
जैसे यदि चिकित्सक रोगी की आवश्यक प्रक्रिया या चिकित्सा करने के बजाय उसकी इच्छा पूर्ति करने में लग जाए उसे उसकी इच्छा अनुसार खाने-पीने की छूट दे दे तो फिर ना तो रोगी की चिकित्सा हो पाएगी और ना ही रोगी रोग मुक्त हो सकेगा |
रोगी को रोग मुक्त होने के लिए तो चिकित्सक के अनुसार ही चलना होगा, चिकित्सक के परामर्श को मानना होगा वैसे ही एक शिष्य को भी अपनी इच्छा से नहीं गुरु की इच्छा से चलना होता है |
चेतना के शिखर
गुरु की इच्छा को ईश्वर की इच्छा को ही अपनी इच्छा बनाना होता है, तभी तो वह चेतना के शिखर को छू पाता है | वरना अपनी इच्छा को ढोते फिरने के चक्कर में छोटा ही बना रह जाता है, फिर वह बीज से वृक्ष नहीं बन पाता वह फिर अपने जीवन के शीर्ष को नहीं छुपाता और इसी तरह घिसी पिटी जिंदगी जी कर संसार से विदा हो जाता है |
कहने को तो हम भी स्वयं को अपने गुरु का सच्चा शिष्य मानते हैं | हम भी अपने आप को भगवान का भक्त मानते हैं | हम अपने आप को ईश्वर का गुरु का उपासक मानते हैं और अक्सर हम ईश्वर दर्शन को मंदिरों में जाते भी हैं और आश्रमों में जाते भी हैं |
आराध्य से अपने गुरु से हम मिलते भी हैं |
अपने आराध्य से अपने गुरु से हम मिलते भी हैं पर वहां जाकर भी क्या हम अपने आराध्य का अपने भगवान का अपने गुरु का दर्शन कर पाते हैं क्या हम सचमुच अपने गुरु के दरबार में ईश्वर के दरबार में उपासक बनकर जा पाते हैं?
शायद नहीं क्यों ? क्योंकि गुरु के समीप बैठ कर भी ईश्वर के समीप बैठ कर भी हम उपासना से दूर ही रहते हैं | उनके पास होकर भी हम उनसे दूर ही होते हैं क्योंकि हम वहां भी अपनी इच्छाओं की टोकरी को अपने सिर पर रखे होते हैं वहां हम रोते हैं, गिड़गिड़ाते हैं, ढेर सारी याचनाएं करते हैं, पर ईश्वर के समीप जाने का गुरु के समीप जाने का बैठने का वास्तविक उद्देश्य तो हमें हमारे गुरु ही बता पाते हैं |
उपासना का असली मर्म तो हमारे गुरु ही बता पाते हैं | हमारे आराध्य हमारे गुरु ही हैं, जो हमें बताते हैं कि उपासना याचना नहीं और याचना उपासना नहीं हम ईश्वर के पास जाएं, अपने गुरु के पास जाएं पर याचक बनकर नहीं उपासक बनकर दर्शक बनकर नहीं दृष्टा बनकर | तभी तो उनके पास जाने कि उनके पास बैठने की सार्थकता हो सकेगी |
ब्रह्मज्ञानी गुरु
उस विराट ईश्वर की प्रतिमा के समक्ष खड़े होकर उस ब्रह्मज्ञानी गुरु के समीप खड़े होकर भी उनके पास होकर भी उनके समीप होकर भी उनके समीप बैठ कर भी उनसे स्वयं को बंधन में बांधने वाली याचनाएं क्यों करना | वह तो उनकी विराटता की अनुभूति करनी चाहिए उनकी विराटता को स्वयं के अंतर के आकाश में उतारते हुए दिखना चाहिए |
वहां देखना चाहिए की जैसे हमारे आराध्य हमारे भगवान, हमारे गुरु के हृदयाकाश में कोटि कोटि सूर्य चंद्र व तारे जगमगा रहे है | वैसे ही क्या हमारे स्वय के हृदयाकाश में भी अब ज्ञान, भक्ति, वैराग्य आदि के रूप में कोटिश सूर्य चंद्र व तारे जगमगाने लगे है |
निष्कर्ष
क्या हमारे अंतस से अज्ञान का अँधेरा मिटने लगा है जैसे आकाश में हजारो सूर्यो के एक साथ उदय होने से उत्पन जो प्रकाश हो वह भी हमारे विश्वरूप परमात्मा के प्रकाश के सददेश कदाचित ही हो |
हमारे गुरु के प्रकाश के सदृश कदाचित ही हो यही वो दिव्य अनुभूति है जो हमें उपासना में करनी है | जैसे दर्पण में हम अपने रूप को भलीभांति देख पाते हैं वैसे ही ईश्वर की गुरु की प्रतिमाओं में हम अपने वास्तविक रूप को देख पाते हैं |
