हदय की सरलता से प्रभु का साक्षात्कार | Hindi Gyan

मनुष्य का ह्रदय ज्यों ही निर्मल, विशुद्ध, सभी छल प्रंपचों से मुक्त परम, सरल एवं शांतअवस्था को प्राप्त होता है | त्यों ही अकारण करुण, अशरण, शरण, करुणा-वरुणा, लय, कल्याणोक्तान, समस्त कल्याण प्रभु की अनुपम झांकी ज्ञान नेत्रों से दिखने लग जाती है | 

हदय की सरलता से प्रभु का साक्षात्कार

या यूं कहिए कि उस समय उनकेअतिरिक्त दूसरा दिखता ही नहीं | पूज्य पाद प्रातः स्मरणीय परम भागवत संत कुल कमल दिवाकर भक्त शिरोमणि परम गुरु गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने इसका जगह-जगह उल्लेख किया है | स्वयं भगवान श्री रामचंद्र जी के शब्दों में भी कहते हैं |

भागवत साक्षात्कार

वस्तुतः यह ऐसा विषय है कि, समझते बनता है, समझाते नहीं श्रीमद्भागवत की प्रथम स्कंधका दूसराअध्याय बड़ा ही सुंदर महत्वपूर्ण उपादेय तथा हितग्राही है | इसका प्रत्येक अक्षर माननीय, आदरणीय एवं संग्रहनिया है | मुझे तो ऐसा लगता है कि भागवत कथा रामचरितमानस के प्रतीक अक्षर ही भगवान के मूर्तिमान स्वरूप है | इसमें संदेश भी नहीं करना चाहिए |

हां तो उसी भागवत के दूसरे अध्याय में भागवत साक्षात्कार के पूरे नियम बताए गए हैं, और वे है अत्यंत निश्चित और तत्काल फल दिखाने वाले निसंदेह, वहां भागवत उच्चारण अमृत पान को ही भगवत साक्षात्कार का मूल बतलाया गया है और यही संपूर्ण भागवत कथा रामचरितमानस का मत भी है | 

फिर भी यह सर्व सम्मत है कि उसमें निष्पक्ष एवं हृदय की सरलता की भी महती आवश्यकता है | यद्यपि भागवत  का तथोक्त प्रसंग किंचित विस्तत है, किंतु वह इतना रम्य ह्रदया कृषक एवं मधुरीमा मय है कि सर्वथा माननीय है |

आदित्य ज्ञान

अथच प्रभु के साक्षात्कार में उनके साथ सम्भन्ध करने में महान सहायक है | अतएव पाठको की सेवा में उपस्थित करने योग्य है वहां सूतजी के निर्मल ह्रदय के ये परम दव्योद्गार है |  

मुनि गण आप लोगों ने बड़ा अच्छा किया, जो जगन मंगल मंगलमय श्री कृष्ण के संबंध में प्रश्न पूछे | महात्माओं पुरुष का तो सबसे बड़ा धर्म वही है, जिसके अनुष्ठान से श्री कृष्ण के चरणों में अकारण अहेतु की अभियंता भक्ति उत्पन्न हो जाए इससे परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है | 

भगवान श्रीकृष्ण में प्रयुक्त भक्ति शीघ्र ही वैराग्य एवं आदित्य ज्ञान को उत्पन्न करती है, इसीलिए अनुष्ठित समस्त धर्म कर्म यदि भगवा चर्चा भवदीय वार्ता में परमोत कंठा एवं अनन्य रति ना उत्पन्न कर सके तो वे केवल श्रम ही हुए क्योंकि धर्म का फल मोक्ष भगवत प्राप्ति होना चाहिए ना कि अर्थ | 

इंद्रियतृप्ति

इसी प्रकार अर्थ की सफलता धर्मोपाजर्न में है, कामोपभोग में नहीं काम का तात्पर्य जीवन धारण के निर्मित भोजन  शयन में है | इंद्रियतृप्ति में उनकी कोई ममता नहीं और जीने का भी यही अर्थ होना चाहिए कि, प्राणी तत्व को समझ सके | 

स्वर्ग प्राप्ति से मनुष्य कृतार्थ नहीं हो सकता और वस्तुतः तत्व भी वही है, जिससे जिसे संख्या वादी ज्ञान कहते हैं | वेदांती ब्रह्म कहते हैं, योगी परमात्मा कहते हैं और भक्त भागवत जिसे भगवान कहते हैं | उस तत्व को मननशील मुनि, जैन, ज्ञान, वैराग्य, युक्त, श्रवण, आदि भक्ति के सहारे आत्म तत्व के रूप में आत्मा में ही साक्षात देखते हैं |

इसलिए ब्राह्मण श्रेष्ठ से यह सिद्ध हुआ है, कि सारे धर्म-कर्मो  के अनुष्ठान का पर्यवसन  भगवान को प्रसन्न करने में है पर जब यही बात है, तब क्यों नहीं एकाग्र मन से बराबर सात्वतापति श्री भगवान की ही चर्चा सुनी जाय कहीं जाय और उनकी ही ध्यान और पूजन किया जाए | 

विशुद्ध चित्र

श्रवण कीर्तन श्री कृष्ण अपनी कथा सुनने सुनाने वालों के अंततः करण में तमासिन होकर संपूर्ण अमंगलमय काम क्रोध आदि का संहार कर डालते हैं | इस प्रकार रज तम आदि भावों एवं काम क्रोध लोभ आदि भयंकर दुर्गुणों से अनावृत विशुद्ध चित्र में विशुद्ध तत्व का आवि भार्व  होता है एवं आत्म प्रसाद की उपलब्धि होती है | 

इसी प्रकार मुक्तमा प्रसन्न मन और पुरुष के हृदय में भागवत के योग्य से भागवत तत्व विज्ञान का उदय होता है और फिर तात्शद हृदय की सारी ग्रंथियां कट जाती हैं | सारे संशय नष्ट हो जाते हैं, और सारे कर्म श्रींद हो जाते हैं | 

सत्य की महत्वता

वस्तुतः यह हृदय की ग्रंथियां ही सारे अनर्थो की जड़ है | यूं तो प्राणी के हैदर में परमानंद कंद सच्चितानंद प्रभु का नित्य निवास है ही किंतु हम छल एवं अनेकानेक परपंचों से उन पर पर्दा डाले हुए रहते हैं और भूल कर भी उनकी और दृष्टिपात करना नहीं चाहते | 

प्राणी यदि अंत हृदय और बाहों में सामंजस्य स्थापित कर सके तो, परमानंद रूप परमात्मा के अतिरिक्त कोई भी वस्तु ना दीख सकेगी सत्य की महत्वता बतलाते हैं और उसकी जो हृदय में है वही मुंह से कहा जाए यही परिभाषा बतलाते हैं पर वस्तुता ह्रदय में तो साक्षात परमात्मा ही है इसीलिए परम और चरम सत्य वही है |

छल कपट का परित्याग

सचमुच जब तक प्राणी सारे छल कपट का परित्याग कर सर्वात मना भगवान का आशय नहीं ले लेता, उसे परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती हृदय की ग्रथि छोड़कर वह निश्चित हो जाता है और पुनः धर्म-कर्म आदि की चिंता को छोड़ कर वह सदा सरवन निशंक होकर भगवत संबंधी वार्ताओं में ही रत रहता है | 

भगवान नाम यश रूप आदि का ध्यान ही उसका जीवन होता है | किसी भी बुद्धिमान को यह तिरोहित ना होना चाहिए कि हृदय ग्रंथि का मूल कारण तथा छल का प्रमुख आवरण प्राणी का हर्ष होता है और यही हर्षण संपूर्ण अनर्थ ओं का मूल एवं भगवत ध्यान आदि को से च्युत करने वाला होता है |

निष्कर्ष

हष्ट पुरुष अशांत तथा असमाहित भी होता है और श्रुति उसे प्रज्ञान के योग्य नहीं बतलाती | इसी तरह हर्ष एवं माया के अन्याय आवरणादिको से उन्मुक्त विशुद्ध, निर्मल, चित से धारावाहिक पुरुष ही सरलता पूर्वक प्रतिशत भगवान की दिव्य झांकी का आलोक प्राप्त करता चलता है |

दीनता और तदननुकूल निश्छलता हो तो प्रभु के आलोक में किंचिदपि विलंब नहीं पर जब हम वस्तुतः सर्वथा दीन हीन पतित एवं गए गुजरे हो कर भी झूट मुठ की स्तंबध्ता, प्रसन्नता, नाटकीय प्रदर्शन करने लग जाते हैं | तब वस्तुता आपने दुर्भाग्य को क्या कहा जाए | 

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